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Wednesday, April 24, 2019

What is option trading in share market. कॉल-पुट ऑप्शन क्या है

What is option trading in share market. कॉल-पुट ऑप्शन क्या है 

शेयर मार्केट में ट्रेडिंग तीन प्रकार से होती है पहला सीधे किसी कम्पनी के शेयर खरीद कर, दूसरा फ्यूचर और तीसरा ऑप्शन द्वारा। इनमे लॉन्ग या शार्ट करके सौदे किये जाते हैं। शेयर्स की सीधी खरीद में आप जितने चाहें उतने शेयर ले सकते हैं।  परन्तु फ्यूचर या ऑप्शन में आपको कम से कम 1 लॉट खरीदना  होता है यह लॉट साइज किसी भी कम्पनी का शेयर के रेट के अनुसार भिन्न भिन्न होता है। ऑप्शन डेरिवेटिव  के अंतर्गत आते  हैं।
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        इंट्राडे को छोड़कर जब हम सीधे किसी कम्पनी का शेयर खरीदते हैं तो हमें मार्जिन सुविधा नहीं मिलती। पर यदि हम उसी कम्पनी के शेयर का लॉट फ्यूचर में लेते हैं तो कुल वैल्यू का 10 -20% रकम लगाकर खरीद पाते हैं। फ्यूचर ट्रेडिंग की जानकारी के लिए पढ़े - 

   
ऑप्शन के जरिये ट्रेड करने में हमें फ्यूचर से भी कम रकम की जरूरत पड़ती है। ऑप्शन में ट्रेड, आपको शेयर का पूरा मूल्य दिए बिना शेयर के मूल्य से लाभ उठाने देता है। यह ऑप्शन ट्रेडिंग को आकर्षक बना देता है।    

 इसे एक उदाहरण से समझते हैं

example -  

मान लीजिये स्टेट बैंक के शेयर का भाव 305/- चल रहा है और आपको लगता है कि 1 महिने के भीतर इसका भाव बढ़कर 310/- हो जायेगा। अब हम इसे लेने की तीनों विधियों कैश, फ्यूचर और ऑप्शन  में तुलना करके देखते हैं -


1. कैश में -  
यदि आप इसके 3000 शेयर खरीद कर रखना चाहें तो आपको 9 लाख 15 हजार रूपये लगेंगे। अगर शेयर का भाव 5/- बढ़ता है तो 9 लाख लगाने के बाद आपका मुनाफा 3000 x 5  =15000/- होगा। यहां आप जितने दिन शेयर रखना चाहें रख सकते हैं क्योंकि आपने पूरे पैसे लगाकर शेयर खरीदे हैं। 

2. फ्यूचर में - 
इसे यदि फ्यूचर में लेते हैं तो इसका कम से कम 1 लॉट लेना होगा स्टेट बैंक का लॉट 3000 का है और इसे लेने के लिए लगभग एक लाख पैसठ हजार रूपये देने होंगे जो कि कैश खरीदी में लगे 9 लाख रूपये की तुलना में बहुत कम हैं। 

         पर फ्यूचर ट्रेडिंग में M2M के अंतर्गत डेली होने वाला घाटा आपको भरना होता है। इसका मतलब आपका 305/- में लिया हुआ शेयर अगर 302/- में उस दिन बंद होता है तो 3/- प्रति शेयर नुकसान के हिसाब से 3000 x 3 =9000/- आपको भरना होगा। अगर रेट बढ़कर बंद होता है तो उतना प्रॉफिट आपके खाते में जोड़ दिया जायेगा। यह सिलसिला एक महिने के भीतर, जब तक आप स्क्वायर ऑफ नहीं करते, तब तक चलेगा। 

3. ऑप्शन के जरिए -  
अगर ऑप्शन के जरिए ट्रेड करना हो तो अगले माह का 300/- स्ट्राइक प्राइस का ऑप्शन 18/- में मिलेगा।  3000 का  1 लॉट लेने के लिए आपको खर्च करना पड़ेगा 18 x 3000 =54000/- अब यहां आपने 300 स्ट्राइक प्राइस का जो ऑप्शन 18 /- में लिया है उसमे  13/- टाइम वैल्यू है। यह टाइम वैल्यू दिन बीतने के साथ घटना शुरू हो जाएगी और एक्सपायरी के दिन शेयर का भाव 300/- तक गिर गया तो आपका लगाया हुआ 54000/- लगभग शून्य हो जायेगा।

          फिर प्रॉफिट किस दशा में होगा - अगर बहुत जल्दी (1 सप्ताह के भीतर) ही स्टेट बैंक के शेयर का प्राइस बढ़कर 305/- से 315/-हो जाए तो आपका 18/- वाला ऑप्शन 23/- का हो सकता है इस तरह आपको 15 हजार रूपये का मुनाफा होगा। यहां आपकी लागत मात्र 54 हजार थी। यहां टाइम वैल्यू का रोल इम्पोर्टेन्ट है। अगर एक्सपायरी के करीब शेयर  प्राइस 315/- हुआ तो आपके 300 स्ट्राइक प्राइस वाले ऑप्शन की संभावित वैल्यू 15/- ही मिलेगी, जिसे आपने 18/- में लिया था।
board game

ऑप्शन क्या हैं  (what is option )

ऑप्शन में ट्रेडर्स के पास ट्रेडिंग के कुछ विकल्प होते हैं। ऑप्शन ट्रेडिंग की मंथली  सीरीज  होती है। इसकी एक्सपायरी हर महीने के अंतिम गुरुवार को रहती है  निफ़्टी और बैंक निफ़्टी इंडेक्स के वीकली ऑप्शन भी होते हैं जिनकी एक्सपायरी हर गुरुवार को होती है। 

             एक्सपायरी डेट के पहले ये ऑप्शन कभी भी खरीदे और बेचें जा सकते हैं। ऑप्शन में एक्सपायरी डेट, लॉट साइज और एक srike price होती है। ऑप्शन 2 तरह से ट्रेड होते हैं- ऑप्शन खरीद (बाय) करके और ऑप्शन सेलर बनके।  

        अक्सर फायदा ऑप्शन सेलर को ही होता है। पर ऑप्शन सेलर को मार्जिन मनी अधिक लगती है।  ऑप्शन बायर को जिस srike price का ऑप्शन लेना है उस प्राइस को लॉट साइज से गुणा करने पर जो राशि आती है उतनी ही रकम 1 लॉट खरीदने में लगती है। परन्तु उसी स्ट्राइक प्राइस के ऑप्शन को सेल करने पर सिक्योरिटी के रूप में एक्स्ट्रा अमाउंट ब्रोकर के पास जमा करना पड़ता है। 

    क्योकि ऑप्शन सेल करने पर लॉस अनलिमिटेड हो सकता है। सौदा गलत पड़ने पर 50/- का सेल किया हुआ ऑप्शन 500/- या अधिक में भी बाय करना पड़ सकता है। इसलिए मार्केट में ट्रेडिंग का अनुभव बढ़ने के बाद ही ऑप्शन सेल करने की सोचना चाहिए। ऑप्शन सेलर ज्यादा स्मार्ट माने जाते हैं। ऑप्शन 2 प्रकार के होते हैं कॉल ऑप्शन और पुट ऑप्शन। 

कॉल ऑप्शन

जब आपको लगे कि भविष्य में स्टॉक या इंडेक्स के प्राइस में बढ़त होने वाली है उस समय कॉल ऑप्शन खरीदे जाते हैं। जब कीमत स्ट्राइक प्राइस से बहुत अधिक बढ़ जाती है उस समय कॉल ऑप्शन खरीदने वाले को फायदा होता है। 

          किसी 100/- वाले शेयर का 105 स्ट्राइक प्राइस का ऑप्शन buy करने का मतलब हुआ कि बायर एक्सपायरी डेट तक उस शेयर का प्राइस 105 के आगे निकलने की उम्मीद कर रहा है। स्टॉक के साथ इंडेक्स ऑप्शन भी होते हैं।  इंडेक्स ऑप्शन में ज्यादातर ट्रेड निफ़्टी और बैंक निफ़्टी के ऑप्शन में किया जाता है। 
chess board

पुट ऑप्शन



जब स्टॉक या मार्केट में मंदी दिखाई पड़े उस समय पुट ऑप्शन खरीद कर ट्रेड किया जाता है। यहां स्ट्राइक प्राइस के नीचे भाव जाने पर पुट ऑप्शन खरीदने वाले को फायदा होता है। पुट ऑप्शन, कॉल ऑप्शन के बिल्कुल विपरीत है।  किसी 100/- करंट प्राइस वाले शेयर का 95 srike price का पुट लेने का मतलब है, put बायर ये सोचता है कि शेयर का प्राइस 95 के नीचे जाने वाला है। 

      स्टॉक प्राइस  में अचानक गिरावट आने या बाजार में गिरावट आने की स्थिति में निवेशक अक्सर सुरक्षा के रूप में पुट ऑप्शन खरीदते हैं। पुट ऑप्शन आपको अपने शेयर बेचने और निवेश पोर्टफोलियो को  बाजार की वोलैटिलिटी  से बचाने की क्षमता देते हैं। 


       अगर आपने किसी शेयर में निवेश किया हुआ है और आगे आने वाले किसी कारण से आपको आशंका है कि शेयर का भाव अचानक गिर सकता है तो अपने पोर्टफोलियो से उस शेयर को बाहर करने की जगह उसका पुट ऑप्शन खरीद सकते हैं। इससे यदि गिरावट आई तो उसकी भरपाई पुट ऑप्शन को बेच कर की जा सकती है। इस अर्थ में, पुट ऑप्शंस का उपयोग आपके पोर्टफोलियो को हेज करने, या आपके पोर्टफोलियो के जोखिम को कम करने के लिए किया जा सकता है।

 इन द-मनी ऑप्शन  

जब ऑप्शन का स्ट्राइक प्राइस, संबंधित इंडेक्स/शेयर के बाजार भाव से कम होता है तो इन द-मनी कॉल ऑप्शन लागू होता है। इन द-मनी पुट ऑप्शन वो होता है जब ऑप्शन का स्ट्राइक प्राइस, संबंधित इंडेक्स/शेयर के बाजार भाव से ज्यादा होता है। जैसे किसी शेयर का भाव 100/- है तो 95 स्ट्राइक प्राइस वाला कॉल ऑप्शन इन द-मनी कहलायेगा और 105 स्ट्राइक प्राइस वाला आउट ऑफ़ मनी कहा जायेगा। 

इन-द-मनी के सौदे काटना जरूरी            

एक्सपायरी के पहले इन-द-मनी लॉन्ग के सौदे काटना जरूरी हैं क्योंकि इन-द-मनी लॉन्ग के सौदे एक्सपायर होने पर ज्यादा एसटीटी देना होगा। कॉन्ट्रैक्ट वैल्यू और प्रीमियम जोड़कर एसटीटी लगाया जाता है। इन-द-मनी लॉन्ग एक्सपायर होने पर 0.125 फीसदी एसटीटी लगेगा। इन-द-मनी लॉन्ग एक्सपायरी से पहले काटने पर 0.017 फीसदी एसटीटी लगेगा। इन-द-मनी शॉर्ट पोजीशन एक्सपायर होने पर एसटीटी कॉन्ट्रैक्ट वैल्यू पर नहीं मिलेगा।

 conclusion 

अंतिम रूप से कहें तो ऑप्शन, बड़ा पैसा लगाए बिना, मार्केट में बड़ी पोजीशन बनाने का एक शानदार तरीका है। यह जैकपॉट की तरह आपके पैसे को कई गुना करने की क्षमता रखता है। बशर्ते आपकी सोची हुई दिशा में तेजी से मूवमेंट आये। sideways मार्केट में ऑप्शन खरीद कर पैसा नहीं कमाया जा सकता। उस समय ऑप्शन को शार्ट करके पैसा कमाया जाता है। ऑप्शन को शार्ट करने में फ्यूचर की तरह मार्जिन देना पड़ता है। 

       याद रखें कि  ऑप्शन ट्रेडिंग कुशल ट्रेडर के लिए ही हैं जिन्हें मार्केट का अच्छा अनुभव है। ऑप्शन ट्रेडिंग बहुत जोखिम भरा काम है और इसमें गहन सतर्कता की आवश्यकता है। option  में तगड़ा मुनाफा भी होता है परन्तु तथ्य ये है कि 90% ऑप्शन बायर यहां घाटा  उठाते हैं। 

       शेयर बाजार में अचानक तेजी मंदी आना अनुभवी निवेशकों के लिए भी नर्व ब्रेकिंग हो सकते हैं। अपने पैसे के साथ जोखिम लेना हमेशा चिंता का विषय होता है। शेयर बाजार में बड़े नुकसान से बचने लिए ऑप्शन  का प्रयोग हेजिंग  के लिए कर सकते हैं।  जोखिम प्रबंधन रणनीति के लिए ऑप्शन का उपयोग किया जाता है।

         आशा है इस आर्टिकल "What is option trading in share market. कॉल-पुट ऑप्शन क्या है "  से आपकी शंकाओं का समाधान हो गया होगा। यदि कुछ पूछना चाहें या कोई सुझाव हो तो कमेंट में लिखें। शेयर मार्केट की और भी जानकारी के लिए इस वेबसाइट पर विजिट करते रहें। 

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