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Saturday, June 22, 2019

Poor to rich - success stories of Kalpana saroj & Prem ganapathy

Poor to rich - success stories of Kalpna saroj & Prem ganapathy

बहुत गरीब से अमीर बने - कल्पना सरोज और प्रेम गणपति की कहानी 

सफलता और असफलता दोनों जीवन का हिस्सा है और दोनों स्थायी नहीं हैं। लोग सोचते हैं कि अमीर बनने के लिए धनी परिवार से संबंधित होना जरूरी है पर दुनिया में ऐसे भी लोग हुए हैं जो एक समय बहुत गरीब हुआ करते थे और इन लोगों ने अपने काम की शुरुवात बहुत छोटे स्तर से की थी लेकिन बाद में दुनिया के धनी लोगों में गिने गए। हमारे देश में भी ऐसे लोग हैं जिन्होंने कड़ी मेहनत और आत्म-विश्वास के बल पर सभी बाधाओं को पार करते हुए बहुत ऊँचा स्थान प्राप्त किया। 

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     कुछ लोग विरासत में धन प्राप्त करके धनी हो जाते हैं लेकिन कुछ फर्श से अर्श तक स्वयं के बल पर पहुंचते हैं। ऐसे व्यक्तियों के जीवन की कहानी बहुत प्रेरणादायी होती है। इनसे हमें विपरीत परिस्थितियों में परिश्रम, धैर्य और संकल्प के साथ डटे रहने की सीख मिलती है। आइये जानते हैं ऐसे ही 2 लोगों के बारे में जिन्होंने फर्श से अर्श तक का सफर किया है। इनमें से एक हैं कल्पना सरोज (Kalpna saroj) जो कमानी ट्यूब्स की मालकिन हैं और दूसरे हैं प्रेम गणपति (Prem ganpathy) जो डोसा प्लाजा फ़ूड चैन के मालिक हैं -



 कल्पना सरोज  (Kalpana saroj)

1. गरीबी और बाल विवाह का दंश 

कल्पना सरोज की कहानी उन सब के लिए प्रेरणा दायक है जो जीवन में थोड़ी सी परेशानियां आने पर निराश होकर बैठ जाते हैं। कल्पना के जीवन को देखने पर पता चलता है कि "ज़िंदगी की यही रीत है, हार के बाद ही जीत है." कल्पना सरोज का जन्म 1961 में महाराष्ट्र के एक गांव रोपरखेड़ा में दलित परिवार में हुआ था। उसके पिता पुलिस कांस्टेबल थे, परिवार बड़ा होने के कारण गुजारा मुश्किल से हो पाता था।

     कल्पना का विवाह 12 साल की अवस्था में अपने से बहुत बड़े उम्र के आदमी से हो गया था। विवाह के बाद कल्पना, पति के साथ मुंबई के स्लम्स में रहने आ गई। यहां ससुराल वालों की तरफ से उसे तरह तरह की यातनाएं झेलनी पड़ी।
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2. आत्महत्या की कोशिश -       

 शादी के 6 महीने बाद आये उसके पिता ने ये सब देखा तो वे कल्पना को वापस अपने घर ले आये। यहां भी उसे ताने सुनने को मिले जिससे परेशान होकर कल्पना ने आत्महत्या करने की सोची और अपनी बुआ के घर जाकर जहर पी लिया। परन्तु संयोग से उसकी बुआ ने समय रहते डॉक्टर के पास ले जाकर उसकी जान बचा ली। ये कल्पना के लिए एक तरह से नया जीवन था, अब उसने सोचा की इस तरह मरने से अच्छा है कि कुछ किया जाए। उसे लगा कि गांव में रहकर कुछ नहीं हो पायेगा इसलिए वो अपने चाचा के यहां मुंबई आ गई। इस समय वो 16 साल की थी। 

3. कपड़ा मिल में काम -      

 कल्पना को सिलाई का कुछ काम आता था इसलिए उसके चाचा उसे लेकर एक कपड़ा मिल में गए। वहाँ सिलाई का काम आने के बावजूद कल्पना सिलाई मशीन चलाकर नहीं दिखा पाई। इसलिए उसे मशीन चलाने की जगह धागा काटने का काम मिला। उसका वेतन था 2 रूपये रोज। दिन गुजरते गए। धागा काटते काटते कल्पना को सिलाई मशीन चलाने का काम भी मिल गया और उसकी आमदनी कुछ बढ़ गई। फिर उसने सिलाई मशीन खरीद ली और घर पर ही 16 से 18 घंटे प्रतिदिन सिलाई का काम करने लगी।

4. स्वयं का बिज़नेस -        

अब कल्पना के दिमाग में बिज़नेस करने का विचार आया। इसके लिए उसे पैसों की जरूरत थी। कल्पना के पड़ोस में एक आदमी रहता था जो लोगों को बैंक से लोन दिलवाने का काम करता था। इस आदमी ने उसे बताया की  50 हजार का लोन लेने के लिए 10 से 15 हजार रूपये घूस के रूप में देने पड़ेंगे। कल्पना को यह मंजूर नहीं था। उसने स्वयं बैंक जाकर न सिर्फ खुद के लिए लोन निकाला  बल्कि दूसरों को भी लोन दिलवाने में मदद की। इस तरह उसकी पहचान का दायरा बढ़ा और उसने अपना फर्नीचर का काम स्टार्ट कर दिया। 

5. दूसरा विवाह और पति की मृत्यु -

इसी बीच एक फर्नीचर के व्यवसायी से उसने विवाह कर लिया। पर नियति को कुछ और ही मंजूर था। उसकी खुशियों को ग्रहण लगा और जब कल्पना 2 बच्चों की माँ थी तभी उसके पति का निधन हो गया। समय बीतता रहा। 

6 प्रॉपर्टी की खरीद से मुनाफा 

एक दिन उसके पास एक आदमी आया जिसे अपनी जमीन बेचनी थी। जमीन की कीमत ढाई लाख रूपये में से उस आदमी को अभी सिर्फ 1 लाख रुपये चाहिए थे। कल्पना ने किसी तरह रुपयों का प्रबंध करके वह जमीन खरीद ली। पर बाद में उसे यह जान कर धक्का लगा कि उस जमीन में कुछ विवाद है। अब कल्पना पीछे नहीं हट सकती थी, उसने भिड़ कर उस विवाद को हल कर लिया। तब तक उस जमीन की कीमत 50 लाख हो चुकी थी। एक बिल्डर के साथ पार्टनरशिप करके कल्पना ने उस जमीन से 5 करोड़ का मुनाफा प्राप्त किया। 
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7. कमानी ट्यूब्स की प्रमुख कैसे बनी?

आइये अब जानते हैं कल्पना सरोज कमानी ट्यूब्स की प्रमुख कैसे बनी? 1960 में स्थापित इस कम्पनी का कामकाज प्रारम्भिक वर्षों में ठीक ठाक चलता रहा लेकिन 1985 में मालिकों और लेबर यूनियन के बीच विवादों के चलते कम्पनी बंद हो गई। सुप्रीम कोर्ट के आदेश से 1988 में कम्पनी के पुराने मैनेजमेंट को बदल कर वर्करों को मैनेजमेंट सौप दिया गया और कम्पनी फिर से शुरू की गई। परन्तु इस बार भी कम्पनी को नहीं चलाया जा सका और कम्पनी पर करोड़ों रुपयों का बैंक का क़र्ज़ हो गया। 

    ऐसी कंडीशन में सन 2000 में जब कम्पनी पर 115 करोड़ का क़र्ज़ था,  वर्कर कल्पना सरोज से मिले। क्योकि उन्हें पता था कि वो एक अच्छी बिज़नेस वुमन हैं। जब वर्कर्स ने कल्पना को बताया कि कम्पनी के 3500 वर्कर्स के सामने रोजी रोटी का संकट है तो कल्पना ने उनकी मदद करने की ठानी। और वो कम्पनी की बोर्ड मेंबर बन गई फिर उसने 10 एक्सपर्ट लोगों की एक टीम बनाई इन लोगों ने कम्पनी की एक रिपोर्ट तैयार की जिससे पता चला कि कम्पनी के क़र्ज़ का आधा से अधिक पेनाल्टी और ब्याज का था। 

       वित्त मंत्री से मिलकर कल्पना ने ये समस्या बताई और कहा कि यदि बैंक कम्पनी का ब्याज और पेनाल्टी माफ़ कर दें तो कम्पनी को बचाया जा सकता है। मंत्री के कहने पर बैंको के साथ हुई मीटिंग में कल्पना सरोज के प्रस्ताव को स्वीकार करते हुए बैंकों ने ब्याज और पेनाल्टी के साथ मूलधन में भी 25 प्रतिशत की कटौती कर दी। इससे वर्कर्स में भी आशा और उत्साह का संचार हुआ। सभी पूरे जोश के साथ काम पर जुट गए।

    कल्पना सरोज सन 2000 से कमानी ट्यूब्स से जुड़ कर काम कर रही थी। यह देखकर कोर्ट ने उन्हें कमानी ट्यूब्स का मालिक बना दिया और 7 साल का समय बैंकों का क़र्ज़ चुकाने के लिए दिया। परन्तु कल्पना सरोज ने 1 साल में ही बैंक का क़र्ज़ चुका दिया साथ ही वर्कर्स को 3 साल का वेतन भी दिया।

        इस तरह अपने मजबूत इरादों के दम पर बिना किसी मैनेजमेंट डिग्री के कल्पना सरोज ने सफल उद्यमी के रूप में अपनी पहचान बनाई।जिसने कभी 2 रूपये दैनिक वेतन में काम किया, उसी कल्पना सरोज की   नेटवर्थ 112 मिलियन डॉलर है।  भारत सरकार की ओर से 2013 में उन्हें ट्रेड एंड इंडस्ट्री में योगदान के लिए "पद्म श्री" से सम्मानित किया गया और भारतीय महिला बैंक के बोर्ड ऑफ़ डायरेक्टर्स में उन्हें शामिल किया गया। 
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प्रेम गणपति (prem ganapathy) डोसावाला


प्रेम ने बर्तन धोने से काम की शुरुवात की और आज वो एक प्रतिष्ठित फ़ूड चैन "डोसा प्लाजा" (dosa plaza) का मालिक है। प्रेम गणपति की कहानी हमें प्रेरणा देती है कि शून्य से शिखर तक का सफर कैसे तय किया जा सकता है। प्रेम गणपति  का जन्म तमिलनाडु के एक गांव में किसान परिवार में हुआ था बचपन से ही उन्होंने दुकानों में काम करना शुरू कर दिया था। इसी दौरान वे एक व्यक्ति के साथ घर में बिना किसी को बताये मुंबई आ गए। मुंबई पहुंचते ही वह व्यक्ति उन्हें छोड़कर भाग गया। 

    प्रेम अब बांद्रा स्टेशन पर फंसे हुए थे। 17 साल के प्रेम का कोई स्थानीय परिचित भी नहीं था और उसे ठीक से हिंदी या अंग्रेजी भी नहीं आती थी। किसी तरह से उसे एक तमिलियन ने एक मंदिर तक पहुंचाया और पूजा करने वालों से चेन्नई लौटने के टिकट के लिए पैसे का योगदान करने की अपील की।पर प्रेम को मुंबई में अपने सपने पूरे होने की उम्मीद नज़र आ रही थी और उसने वापस जाने से इनकार कर दिया।

1. बर्तन साफ ​​करने से शुरुवात -

किसी तरह उसे एक रेस्तरां में बर्तन साफ ​​करने का काम मिला बाद में उसने अपने मालिक से अपील की, उसे वेटर बनने दिया जाए क्योंकि वह 10 वीं कक्षा पास था। मालिक ने इनकार कर दिया। फिर प्रेम  ने वह नौकरी छोड़कर दूसरे रेस्टोरेंट में वेटर का काम ढूंढ लिया यहां अच्छी कस्टमर सर्विस और व्यवहार के कारण लोग उसे पहचानने लगे। 

2. पार्टनरशिप में धोखा मिला -

एक ग्राहक ने उसे एक प्रस्ताव दिया। वह मुंबई में वाशी में एक चाय की दुकान खोलने की योजना बना रहा था। वह चाहता था कि प्रेम उसका पार्टनर बने।  पैसे का निवेश उस व्यक्ति ने किया और दुकान चलाने की ज़िम्मेदारी प्रेम को मिली। दुकान में धंधा अच्छा होने लगा तो दुकान मालिक ने लालच के चलते प्रेम को दुकान से हटा दिया और उसकी जगह एक नौकर रख लिया। इस घटना ने प्रेम को चोट पहुंचाई  पर वह  हारने वाला नहीं था। 

3. खुद का काम शुरू किया -

उसने अपने चाचा से एक छोटा सा कर्ज लिया और अपने भाई के साथ मिलकर अपना खुद का चाय स्टाल खोला। दुर्भाग्य से पड़ोस के निवासियों ने आपत्ति की और उसे वह स्टाल बंद करना पड़ा। फिर उसने एक हाथ ठेले में काम शुरू किया जिसे कई बार पुलिस वालों ने जब्त किया, जिसे प्रेम ने पेनाल्टी देकर कई बार छुड़ाया।  यह तरीका कारगर न होता देखकर प्रेम ने एक जगह खोजकर वहां एक दक्षिण भारतीय नाश्ते का स्टाल स्थापित किया। वह दोसा और इडली बनाने लगा।

    1992-1997 तक 5 वर्षों के दौरान यह डोसा स्टाल बहुत लोकप्रिय हो गया। इसके सफल होने का कारण प्रेम के अनुसार  इसकी स्वच्छता थी। वेटर की स्वच्छ पोशाक और ग्राहक को अच्छी क्वालिटी के साथ ताज़ा सामान उपलब्ध करवाने के कारण यह लोकप्रियता मिली थी।

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4. मिलियन डॉलर बिज़नेस की शुरुवात 

इसके बाद उन्होंने अपने बचाये हुए रुपयों से वाशी स्टेशन के पास एक किराये की दुकान ली और उसका नाम रखा  "प्रेम गणपति साउथ इंडियन फ़ास्ट फ़ूड" बाद में मैक्डोनाल्ड और पिज़्ज़ा हट की तर्ज पर इसे डोसा प्लाजा नाम दिया। और यहीं से शुरुवात हुयी मिलियन डॉलर बिज़नेस की। यहां पर वो कस्टमर की डिमांड के अनुसार पनीर चिल्ली डोसा, चाउमीन डोसा, स्प्रिंग रोल डोसा, अमेरिकन डोसा जैसे कई तरह के डोसा सर्व करने लगे और उनका काम चल निकला। उनके मेनू में 108 प्रकार के डोसा से उन्हें बहुत प्रचार मिला और लोग उन्हें डोसा किंग के नाम से जानने लगे।

5. फ्रेंचाइज़ी देने की शुरुवात 

न्यू बॉम्बे के एक मॉल में फूड कोर्ट स्थापित करने वाली टीम का हिस्सा रहे उनके एक ग्राहक ने उसे फूड कोर्ट में एक स्टाल लेने की सलाह दी और  प्रेम आगे बढ़ने और अपने कार्य का विस्तार करने के लिए तैयार था।  बेहतर ग्राहक सेवा को ध्यान में रखते हुए वे अपने लोगो, ब्रांड, मेनू कार्ड, वेटर ड्रेस आदि में सुधार करते गए और ब्रांड पहचान बनाने के लिए विज्ञापन एजेंसियों में भी गए। जब मॉल का यह आउटलेट चालू हुआ तो इसका मंथली टर्नओवर 6 लाख रूपये था। 
      
      जब उन्हें फ्रैंचाइज़िंग के लिए बहुत ऑफर मिलने लगे तो उन्होंने इसके तौर-तरीकों के बारे में पता लगाया। उन्होंने अपने बिज़नेस के डेवलपमेंट और ऑटोमेशन पर फोकस किया और फ्रेंचाइज़ी देने लगे मार्च 2009 में डोसा प्लाजा का टर्नओवर 5 करोड़ रूपये हो गया। पहले 5 साल में ही उनके 26 आउटलेट हो गए थे। 

   आज देश ही नहीं विदेशों में जैसे ऑस्ट्रेलिया, दुबई और न्यूज़ीलैंड में भी उनके आउटलेट हैं जिनकी संख्या 72 से अधिक है। जिनका करोड़ों का टर्नओवर है और इनका निरंतर विस्तार हो रहा है। इस तरह बांद्रा स्टेशन में बिना पैसों के खड़ा प्रेम गणपति अपनी बेहतर ग्राहक सेवा, स्वच्छता के साथ लगन और परिश्रम के बल पर करोड़पति बनने में सफल हुआ। 

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